आज के परिपेक्ष्य मे हम सभी सफलता के गगनचुंभी शिखरों को छूना चाहते हैं। वैसे तो सफलता के मापदंड हम सभी के लिए अलग-अलग होते हैं, लेकिन मोटे तौर पर एक अच्छे व्यावसायिक शिक्षण संस्थान मे प्रवेश सफलता की वह कुंजी है, जिसके माध्यम से हमें सरकारी या कॉरर्पोरेट सैक्टर मे नौकरी और एक सफल एवं खुशहाल जीवन व्यतीत करने का अवसर प्राप्त होता है। आपको क्या लगता है कि क्या हैं सबसे महत्वपूर्ण कारण सफलता हासिल करने के – प्रतिभा, परिश्रम और लक्ष्य। आज मैं आप सभी के साथ संक्षेप मे अपनी कहानी साझा कर रहा हूं और आशा करता हूं आपका एक दूसरे पहलू से साक्षात्कार करवा सकूंगा।

ये कहानी एक ऐसे छात्र की है जिसकी अधिकांश परवरिश मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों में हुई, जिसने आगे चलकर भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान (आईआईटी, IIT) मे प्रवेश पाने मे सफलता हासिल की, चर्चित बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ काम किया और अंततः अपनी स्वयं की कंपनी अपवर्डली की बतौर सह-संस्थापक और चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर (CTO) स्थापना की! अंततः उन्हें एचडीएफसी क्रेडिला का मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी बनने का अवसर मिला। कई बॉलीवुड फिल्मों के विपरीत, इसे अंत तक सस्पेंस बनाए रखने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं ही वह लड़का हूं, इस कहानी का नायक।

इससे पहले आप कोई कल्पना करें, मैं बताना चाहता हूँ मेरे माता पिता दोनों ही काफी शिक्षित हैं। मेरे पिता स्वयं इंजीनियर है और सेवानिवृत होने से पूर्व जीवन पर्यन्त जल विभाग, मध्यप्रदेश शासन मे कार्यरत रहे हैं। मेरा अधिकांश बचपन शहडोल जिले के छोटे से गाँव देवलोंद मे व्यतीत हुआ, जहां सोन नदी पर बहुउद्देशीय बाणसागर बांध निर्मित किया गया है और आठवीं कक्षा तक की शिक्षा भी यहीं अर्जित की।
मेरे बचपन के ऐसे अनेक कभी न भुलाने वाले संस्मरण हैं, जो मेरे शहरी मित्रों को काफी अचंभित कर सकते हैं। उदाहरणार्थ मैंने तैरना सोन नदी मे सीखा, बचपन मे क्रिकेट और फुटबाल के अलावा कंचे, गुलेल और गिल्ली डंडा के खेल खेलते हुए बड़ा हुआ| मुझे आज भी स्मरण है कि शासकीय विद्यालय, छपारा (जिला सिवनी) की कक्षा नौवीं मे कुर्सी और टेबल भी उपलब्ध नहीं थे और हमने जमीन मे दरी पर बैठ कर ही अध्ययन किया था। इस लेख के शीर्षक मे गिल्ली डंडा का उपयोग आपको अपने ग्रामीण परिवेश मे हुई परवरिश से अवगत कराने के उद्देश्य से ही किया है।

मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं, मैं जब भी ये सोचता हूं कि अगर मेरे पिता का 1992 मे भोपाल स्थानांतरण नहीं होता तो क्या होता? अपने उस मित्र का जितना भी आभार व्यक्त करूँ कम है जिसने दिसम्बर के महीने मे मुझसे ये प्रश्न पूछा कि क्या आईआईटी प्रवेश परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी है और इसका उत्तर देने की अपेक्षा मेरा अज्ञान से ओतप्रोत प्रश्न था – ये किस चिड़िया का नाम है? इसमे कोई संदेह नहीं हैं कि प्रतिस्पर्धा से परिपूर्ण वातावरण मेरे लिए काफी नया था और इसमे मुझे अपने आपको ढालने मे कुछ समय भी लगा। मैंने आईआईटी मे प्रवेश हेतु अथाह परिश्रम भी किया, शायद अपने सहपाठियों से कहीं अधिक क्योंकि मेरे जैसे छात्र के लिए जिसका पूरा शिक्षण ग्रामीण परिपेक्ष्य के शासकीय विद्यालयों मे हिन्दी माध्यम मे हुआ हो, ये कतई सरल नहीं था।

हिन्दी माध्यम के विषय त्रिकोणमिति, भौतिक विज्ञान और रसायन शास्त्र आज भी मेरे स्मृति पटल पर स्थायी रूप से अंकित हैं, जबकि आईआईटी के प्रवेश की तैयारी के लिए अधिकांश अध्ययन सामग्री अँग्रेजी भाषा मे ही उपलब्ध थी! मुझे स्पष्ट रूप से याद है कि मैं ब्रिलियंट ट्यूटोरियल्स और आईई इरोडोव द्वारा भौतिकी पर मेरी पसंदीदा पुस्तक जैसे संसाधनों का उपयोग करते समय ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी पर निर्भर था। मैं अपने गुरूजनों और मित्रों का भी हृदय से आभारी हूं, जिनके मार्गदर्शन और सहयोग के बिना मेरा आईआईटी मे प्रवेश आसान नहीं था।

मैंने किसी भी कीमत पर आईआईटी में शामिल होने के अटूट जुनून के साथ अविश्वसनीय रूप से कड़ी मेहनत की, शायद अधिकांश दोस्तों की तुलना में अधिक कठिन। मुझे यह भी याद है कि मेरे एक दोस्त ने मुझसे कहा था कि जेएनयू आईआईटी दिल्ली से बहुत दूर नहीं है और अगर हमें आईआईटी दिल्ली में दाखिला मिल जाए तो हम सुंदर लड़कियों से मिल सकते हैं। उन किशोरावस्था के दिनों में, मुझे यकीन नहीं है कि इस विचार ने जुनून को कितना बढ़ाया। गंभीर रूप से, जब मैं अब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो मुझे कोई संदेह नहीं है कि जिस एक घटना ने मेरे जीवन को बदल दिया, वह 1992 में मेरे पिता का भोपाल स्थानांतरण था, किसी भी अन्य घटना से कहीं अधिक। मैं बस भाग्यशाली रहा, और सही समय पर सही एक्सपोज़र मिला; बेशक, प्रतिभा और कड़ी मेहनत भी महत्वपूर्ण थी।

मैं अपने आपको काफी भाग्यशाली मानता हूं कि आईआईटी मे प्रवेश पाने मे सफल रहा और फिर जीवन मे निरंतर प्रगति करता रहा और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मेरा उद्देश्य यहां अपनी सफलता का उल्लेख करना बिल्कुल भी नहीं है, हां आप सभी के साथ अपनी यात्रा साझा कर रहा हूँ जो कि एक नदी की यात्रा के समान ऊबड़ खाबड़ मार्गों से होते हुए ही एक समतल धरातल तक पहुंची है| ये कहानी अथक परिश्रम, साहस और आत्मविश्वास का अनूठा उदाहरण है और आशा करता हूं हमारे उन सभी छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत बन सके जिनकी परवरिश ग्रामीण क्षेत्रों या छोटे नगरों मे हुई। अगर मैं जीवन मे सफल हो सकता हूँ, तो वो भी बुलंदियों को छू सकते है बस सही समय पर सही मार्गदर्शन और आत्मविश्वास की आवश्यकता है।

मैं अपने ब्लॉग उद्गम2सागर के माध्यम से आगे आने वाले महीनों में अपने और भी अनुभवों से प्रेरित लेख साझा करूंगा जोकि व्यक्तित्व के विकास एवं व्यावसायिक जीवन मे सफल होने के लिए सहायक हो सकते हैं। उद्गम2सागर एक नदी की उसके उद्गम से समुद्र तक की यात्रा का प्रतीक है, और मेरी यात्रा अब तक ऐसी ही रही है, जिसमें शुरुआती चरण में काफी उथल-पुथल रही है। मैंने प्रतिस्पर्धी परिदृश्य से प्रभावित होकर कई बार पथ परिवर्तन किया है और मुझे बिल्कुल भी पता नहीं है कि आगे क्या होगा। ये लेख मेरे अनुभवों पर आधारित होंगे
एकमात्र उद्देश्य बस यही रहेगा कि देश के एक बहुत बड़े वर्ग को प्रगति की धारा मे जोड़ सकूं, जो एक्सपोजर की कमी के कारण अपनी प्रतिभा का सदुपयोग करने से वंचित रह जाते हैं। अगर आपके पास कोई भी सुझाव हैं जो मुझे इस उद्देश्य को पूरा करने मे सहायक हो सकते हैं, कृपया ईमेल के माध्यम से shashank.agrawal@udgamsagar.com पर लिखें|
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